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भगवान शिव की वेशभूषा के पंद्रह अचंभित कर देने वाले अविश्सनीय रहस्य

जैसा हम जानते है किमहादेव शिवशम्भू हिंदू धर्म में सबसे महत्वपूर्ण देवताओं में से एक है एव त्रिदेवों में एक देव हैं। इन्हें देवों के देव भी कहते हैं। इनको भोलेनाथ, शंकर, महेश, रुद्र (वेद में), नीलकंठ के नाम से भी हम जानते है। तंत्र साधना इनकी भैरव के नाम से भी पहचान है। इनका नाम रुद्र है। यह व्यक्ति की चेतना के अन्तर्यामी हैं। इनकी अर्धाङ्गिनी (शक्ति) का नाम माता पार्वती है।

Lord Shiva Featuresहमारे समस्त हिन्दू देवी – देवताओ में महादेव शिवशम्भू के वेशभूषा सबसे आश्चर्यजनक और रहस्मयी है। आध्यात्मिक रूप से देवाधिदेब के वेशभूषा और रूप में अत्यन्त चौकानेवाले गहरे अर्थ छिपे हुए है। महादेव की जटाएं हैं और उन जटाओं में एक चन्द्र चिह्न होता है। उनके ललाट पर तीसरा नेत्र है। वे गले में सर्प धारण और रुद्राक्ष की माला लपेटे रहते हैं। उनके एक हाथ में डमरू, तो दूसरे में त्रिशूल है। भोलेनाथ संपूर्ण देह पर भस्म लगाए रहते हैं। उनके शरीर के निचले हिस्से को वे बाघछाल से लपेटे रहते हैं। वे वृषभ (बैल) की सवारी करते हैं और कैलाश पर्वत पर ध्यान लगाए बैठे रहते हैं।

पुराणों के अनुसार महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि भगवान शिव के वेशभूषा से जुड़े इन प्रतिको के रहस्यों को जान लेने पर मनुष्य को मोक्ष की प्राप्ति होती है।भगवान शिव की वेश-भूसा ऐसी है की हर धर्म का व्यक्ति उसमे अपना प्रतीक ढूढ़ सकता है। आइये जानते है भगवान शिव और उनकी वेशभूषा से जुड़े रहस्य।

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1. मस्तक पर चन्द्र का विराजमान होना :

मस्तक पर चन्द्र का विराजमान होनाज्योतिष शास्त्र के अनुसार चन्द्रमा को मन का प्रतीक माना गया है। चूकी मन की प्रवृति बहुत चंचल होती है जो मनुष्य के पतन का कारण बनता है. इसी कारण से महादेव शिवशम्भू ने चन्द्रमा रूपी मन को काबू कर अपने मस्तक में धारण किया है। मूलत: शिव के सभी त्योहार और पर्व चान्द्रमास पर ही आधारित होते हैं। पुराणों के अनुसार प्रजापति दक्ष द्वारा मिले श्राप से बचने के लिए चन्द्रमा ने भगवान शिव की घोर तपस्या की। चन्द्रमा की तपस्या से प्रसन्न होकर शिवजी ने उनके जीवन की रक्षा की और उन्हें अपने शीश पर धारण किया।

2. अस्त्र के रूप में त्रिशूल :

अस्त्र के रूप में त्रिशूलपौराणिक कथाओं में महादेव प्रमुखतः दो शस्त्र, धनुष और त्रिशूल धारण करते थे। मान्यता है कि धनुष का अविष्कार उन्होंने खुद किया था लेकिन मान्यतानुसार सृष्टि के प्रारम्भ में ब्रम्ह्नाद से जब भगवान शंकर प्रकट हुए तब उनके साथ ही  सत, रज और तम यानि प्रोटॉन, न्यूट्रॉन और इलेक्ट्रॉन यह तीनो गुण भी हुय्रे और येही तीनो गुण महादेह के तीन शूल यानो त्रिशूल बने । त्रिशूल बहुत ही अचूक और घातक अस्त्र था। इसकी शक्ति के आगे कोई भी शक्ति सामना नहीं कर सकती ।

त्रिशूल 3 प्रकार के कष्टों दैनिक, दैविक, भौतिक के विनाश का सूचक भी है और सृष्टि के क्रमशः उदय, संरक्षण और लयीभूत होने का प्रतिनिधित्व करते भी हैं। माना जाता है कि यह महाकालेश्वर के 3 कालों (वर्तमान, भूत, भविष्य) का प्रतीक भी है। सत, रज और तम तीनो शूल के बीच सामंजस्य बनाये बगैर सृष्टि का संचालन करना कठीन व नामुमकिन था  इसीलिये भोलेनाथ ने त्रिशूल शस्त्र को अपने हाथो में धारण किया ।

3. शिव का सेवक वासुकि विषधर नाग:

शिव का सेवक वासुकि विषधर नागपुराणों में उल्लेख है कि भगवान शिव के गले में जो नाग हर समय आभूषण की तरह लिपटे रहते हैं उनका नाम वासुकी है जो  शेषनाग (अनंत) के बाद नाग लोक के राजा हुए। वासुकी की मदद से ही उनको रस्सी बना कर समुद्रमंथन संभव हुआ था। वासुकी भगवान शिव के परमभक्त थे और इनकी भक्ति से प्रसन्न होकर ही भोले शंकर ने इन्हें अपने गले में आभुषण बतौरधारण करने का वरदान दिया था। भगवान शिव के नागेश्वर ज्योतिर्लिंग नाम से स्पष्ट है कि नागों के ईश्वर होने के कारण शिव का नाग या सर्प से अटूट संबंध है। गले के हार के रूप में लिपटा हुआ वासुकी नाग जकड़ी हुई कुंडलिनी शक्ति का प्रतीक है।

4. डमरू:

डमरूडमरू, जो नाद का प्रतीक है। नाद अर्थात ऐसी ध्वनि, जो ब्रह्मांड में निरंतर जारी है जिसे ‘ॐ’ कहा जाता है।

मान्यता है भगवान शिव संगीत के जनक के रूप में भी जाने जाते है। शिवजी के हाथो में डमरू होने पर भी विचित्र रोचक कहानी है। मान्यता है कि सृष्टि के प्रारम्भ में सुरों व विद्याकी देवी देवी सरस्वती ने अपने प्राकट्य होने के बाद अपनी वीणा के स्वर झंकार से सृष्टि में ध्वनि को जन्म दिया मगर यह ध्वनि बिलकुल सुर व संगीत विहीन थी। भगवान शिव ने ही उस समय नृत्य करते हुए चौदह बार डमरू बजाया और इस ध्वन‌ि से व्याकरण और संगीत के धन्द, ताल का जन्म हुआ। इस प्रकार शिव के डमरू की उत्पत्ति हुई। मान्यता है कि डमरू ब्रम्ह का स्वरुप है जो दूरी से तो विस्तृत नज़र आता है मगर जैसे जैसे ब्रह्म के करीब पहुंचता है बिलकुल संकुचित हो जाता है और दूसरे सिरे से मिल जाता है और विशालता की ओरबढता है। सृष्टि में संतुलन बनायेरखने के लिये भोले शिव डमरू को भी अपने साथ लेकर प्रकट हुए थे । पुराणों के अनुसार शिव के डमरू से कुछ चमत्कारी मन्त्र निकले थे. जिनका जाप करने से लोगों के जीवन से सारे कष्ट दूर हो जाते हैं तथा उनका जीवन सुखमयी बन जाता हैं.

5. शिव का वाहन वृषभ (बैल नदी):

शिव का वाहन वृषभ बैल नदीवृषभ, भगवान शिव का वाहन है. वैदिक साहित्य में शिव शब्द ‘जनता के कल्याण’ (लोक कल्याण) का पर्याय है. और बैल लोक कल्याण कर्ता का वाहक है. हमेशा शिव के साथ रहते हैं। वृषभ का अर्थ धर्म है। मनुस्मृति के अनुसार ‘वृषो हि भगवान धर्म:’। वेद ने धर्म को 4 पैरों वाला प्राणी कहा है। उसके 4 पैर धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष हैं। महादेव इस 4 पैर वाले वृषभ की सवारी करते हैं यानी धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष उनके अधीन हैं।

मान्यता है के वृषभ को नंदी भी कहा जाता है, जो भगवान शिव के एक गण हैं। नंदी ने ही धर्मशास्त्र, अर्थशास्त्र, कामशास्त्र और मोक्षशास्त्र की रचना की थी। वृषभ, जो अपने जीवन प्रर्यंत मानव जाति का कार्य करता है, यही कारण है कि प्रत्येक शिव मंदिर में एक नंदी की प्रतिमा (मूर्ति) भगवान शिव की प्रतिमा (मूर्ति) के साथ होती है।

6. शिवजी की जटाएं:

शिवजी की जटाएंशिव की जटाएं अंतरिक्ष का प्रतीक हैं। अत: आकाश उनकी जटा का स्वरूप है, वायुमंडल का प्रतीक है। घने बादलों से काली और उलझी जटाओं में चंद्रमा विराजमान है। इन्हीं से गंगा का अवतरण भी हुआ है। तो यह अनंत अंतरिक्ष का प्रतीक हैं। भोले बाबा को जटाधारी भी कहा जाता है। भगवान शिव की जटाओं में चंद्रमा से लेकर माँ गंगा तक समायी हुई, प्रवाहित होती हैं। शिव जी की जटाएं बहुत ही विश्मय्कारी है। यह बहुत अचंभित कर देने वाला है।

7. शिव की जटा में गंगा:

शिव की जटा में गंगाजब स्वर्ग से गंगा को धरती पर उतारने का उपक्रम हुआ तो यह भी सवाल उठा कि गंगा के इस अपार वेग से धरती में विशालकाय छिद्र हो सकता है, तब गंगा पाताल में समा जाएगी। संसार के दुखों को हरने वाले शिव शम्भू प्रसन्न हुए और भगवान शिव ने भगवान विष्णु के चरण से निकलने वाली गंगा को अपने सिर पर धारण करके पृथ्वी पर उतारने का राजा भागीरथ को वरदान दिया। ऐसे में इस समाधान के लिए भगवान शिव ने गंगा को सर्वप्रथम अपनी जटा में विराजमान किया और फिर उसे धरती पर उतारा। गंगोत्री तीर्थ इसी घटना का गवाह है। गंगा को शास्त्रों में देव नदी एवं स्वर्ग की नदी कहा गया है। इस नदी को पृथ्वी पर लाने का काम महाराज भगीरथ ने किया था।

8. भभूत या भस्म:

भभूत या भस्मभस्म जगत की निस्सारता का बोध कराती है। भस्म आकर्षण, मोह आदि से मुक्ति का प्रतीक भी है और महाकाल को अतिप्रिय है। चूँकि शिव अपने शरीर पर भस्म धारण करते हैंइसलिये शिवलिंग का अभिषेक भी भस्म से होता है हैं, जिसमें श्मशान की भस्म का इस्तेमाल किया जाता है। भस्म का लेप दर्शाता है कि यह संसार नश्वर है शरीर नश्वरता का प्रतीक है।

9. तीन नेत्र:

भगवान शिव को त्रिलोचन भी कहा जाता है। भोले बाबा का तीसरा नेत्र हमेशा जाग्रत रहता है, लेकिन बंद। शिव का यह नेत्र आधा खुला और आधा बंद है। यह इसी बात का प्रतीक है कि व्यक्ति ध्यान-साधना या संन्यास में रहकर भी संसार की जिम्मेदारियों को निभा सकता है। भोले बाबा के ये तीन नेत्र सत्व, रज, तम तीन गुणों, भूत, वर्तमान, भविष्य, तीन कालों, और स्वर्ग, मृत्यु पाताल तीन लोकों के प्रतीक हैं।

10. हस्ति चर्म और व्याघ्र चर्म:

हस्ति चर्म और व्याघ्र चर्मभगवान शिव के शरीर पर हस्ति चर्म और व्याघ्र चर्म है, अर्थात हाथी और व्याघ्र अर्थात शेर। हस्ती अभिमान का और  व्याघ्र हिंसा व अहंकार का प्रतीक माना जाता है। इसका अर्थ है कि शिव ने हिंसा व अहंकार का दमन कर उसे अपने नीचे दबा लिया हैयानी अहंकार और हिंसा दोनों को दबा रखा है। शिव जी की हस्ति चर्म और व्याघ्र चर्म बहुत ही विश्मय्कारी है। यह बहुत अचंभित कर देने वाला है।

11. शिव का धनुष पिनाक:

शिव का धनुष पिनाकशंकर जी का प्रिय धनुष था। भगवान शंकर ने जिस धनुष को स्वयं अपने हाथों से बनाया था उसकी टंकार से ही बादल फट जाते थे और पर्वत हिलने लगते थे। ऐसा लगता था मानो भूचाल आ गया हो। यह धनुष बहुत ही शक्तिशाली था। इसी के एक तीर से त्रिपुरासुर की तीनों नगरियों को ध्वस्त कर दिया गया था। इस धनुष का नाम पिनाक था। पिनाक शिवधनुष राजा जनक के पास धरोहर के रूप में सरक्षित रखा गया था। उनके इस विशालकाय धनुष को कोई भी उठाने की क्षमता नहीं रखता था। लेकिन भगवान राम ने इसे उठाकर इसकी प्रत्यंचा चढ़ाई और इसे एक झटके में तोड़ दिया।

12. शिव का चक्र:

शिव का चक्रशंकरजी के पास भवरेंदु नाम का चके था जो छोटा, मगर सबसे अचूक अस्त्र माना जाता था।प्राचीन और प्रामाणिक शास्त्रों के अनुसार सुदर्शन चक्र का निर्माण भगवान शंकर ने किया था और निर्माण के बाद, विष्णु जिन्होंने एक फूल की पूर्ति के लिए अपना एक नेत्र निकालकर शिव को अर्पित कर दिया, श्री हरी विष्णु की भक्ति देखकर भगवान शंकर बहुत प्रसन्न हुए और श्रीहरि के समक्ष प्रकट होकर ने विष्णुजी को सुदर्शन चक्र प्रदान किया। जरूरत पड़ने पर श्रीविष्णु ने इसे देवी पार्वती को प्रदान कर दिया। पार्वती ने इसे परशुराम को दे दिया और भगवान कृष्ण को यह सुदर्शन चक्र परशुराम से मिला।

13. त्रिपुंड तिलक:

त्रिपुंड तिलकभगवान शंकर अपने ललाट अर्थात भृकुटी के अंत में मस्तक पर त्रिपुंड तिलक लगाते हैं भस्म या चंदन से तीन रेखाएं बनाई जाती हैं । शैव संप्रदाय के लोग इसे धारण करते हैं। शिवमहापुराण के अनुसार त्रिपुंड की तीन रेखाओं में से हर एक में नौ-नौ देवता निवास करते हैं। इसे लगाने से आ सिर्फ आत्मा को परम शांति मिलती है बल्कि सेहत की दृष्टि से भी चमत्कारिक लाभ देती है।

त्रिपुंड दो प्रकार का होता है- पहला तीन धारियों के बीच में लाल रंग का एक बिंदु होता है। यह बिंदु शक्ति का प्रतीक होता है। आम इंसान को इस तरह का त्रिपुंड नहीं लगाना चाहिए। दूसरा होता है सिर्फ तीन धारियों वाला तिलक या त्रिपुंड। इससे मन एकाग्रचित होता है। त्रिपुंड त्रिलोक्य और त्रिगुण का प्रतीक है जो सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण का प्रतीक भी  और ययहचंदन का या भस्म का होता है। चूँकि त्रिपुण्ड चंदन या भस्म का ही लगाया जाता है, दोनों ही मस्तक को शीतलता प्रदान करते हैं।

14. गले में मुंडमाला:

गले में मुंडमालाभगवान शिव इस जगत के संहारक है इसलिये उनको महाकाल भी कहा गया है  भगवान शंकर के गले में जो १०८ मुंडो की मुंडमाला है, इस बात का प्रतीक है कि भगवान शिव ने मृत्यु को वश में कर रखा है।

15. रुद्राक्ष:

रुद्राक्षमान्यता है कि रुद्राक्ष की उत्पत्ति भगवान शिव के आंसुओं से हुई थी। रूद्राक्ष को शिव की आंख कहा जाता है। रुद्राक्ष दो शब्दों के मेल से बना है पहला रूद्र का अर्थ होता है भगवान शिव और दूसरा अक्ष इसका अर्थ होता है आंसू। रुद्राक्ष भगवान शिव के नेत्रों से प्रकट हुई वह मोती स्वरूप बूँदें हैं जिसे ग्रहण करके समस्त प्रकृति में आलौकिक शक्ति प्रवाहित हुई तथा मानव के हृदय में पहुँचकर उसे जागृत करने में सहायक हो सकी। धार्मिक ग्रंथानुसार 21 मुख तक के रुद्राक्ष होने के प्रमाण हैं, परंतु वर्तमान में 14 मुखी के पश्चात सभी रुद्राक्ष अप्राप्य हैं। इसे धारण करने से सकारात्मक ऊर्जा मिलती है तथा रक्त प्रवाह भी संतुलित रहता है।

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